रूम का माहौल इस वक़्त किसी उबलते समंदर जैसा था। ऊपर से सर्द हवा पर्दा को हौले-हौले झुला रही थी मगर उस हवा की ठंडक इस कमरे की दीवारों से टकराकर बेमायने हो गई थी। बालकनी में खड़े दो जिस्म, दो सुलगते जज़्बात और एक ऐसी खामोशी थी जो किसी भी तूफ़ान से ज़्यादा भारी लग रही थी। रायशा रेलिंग से टिककर खड़ी थी। उसकी गहरी, ठहरी हुई मगर अंदर से जलती हुई निगाहें दृश्यम के चेहरे पर टिकी हुई थीं। वहीं दृश्यम उसके बेहद करीब, दोनों हाथों से रेलिंग पकड़े इस तरह खड़ा था जैसे दुनिया की सारी दीवारें गिर जाएं लेकिन वो अपने कदम पीछे नहीं हटाएगा। उसकी आँखों में जलती हुई आग साफ़ दिखाई दे रही थी। वो बाहर शिमला की वादियों को घूर रहा था मानो उस ठंडे कोहरे में अपने अंदर उठती तपिश को दबा देना चाहता हो। मगर उसके अंदर का तूफ़ान अब काबू से बाहर था। हर सांस उसके गले से नहीं, उसके सीने की गहराई से निकल रही थी।
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